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कोर्ट ने रेप के आरोपी को कहा 5 पौधे लगाओ, गिरफ्तारी नहीं होगी

16 मार्च 2019
www.azaadbharat.org
🚩न्यायलय ने आरोपी को सजा देने के बदले एक अजीबोगरीब फैसला सुनाया है जिसे लेकर खूब चर्चा हो रही है । केवल 5 पौधे लगाने के बदले रेप के आरोपी को गिरफ्तार होने से रोक दिया ।
गाज़ियाबाद में फ़ास्ट ट्रैक में एक रेप आरोपी के खिलाफ गैर जमानती वारंट था, लेकिन न्यायालय ने उसको 5 पौधे लगाने को कहा और गिरफ्तारी रोक दी ।

🚩यदि अदालत इस प्रकार की उदारता दिखा रही है तो ये बताए कि भारत में लाखों निर्दोष विचारधीन कैदी जेल में सड़ रहे हैं, उनकी रिहाई कब होगी ? जो झूठे मुकदमे में जेल में हैं, उनको भी तो तुरंत रिहा करना चाहिए ।
🚩आपको बात दें कि विशेष न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक) राकेश वशिष्ठ ने लोनी निवासी राजू उर्फ कल्लू के खिलाफ एक नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म के चार साल पुराने मामले में पिछले छह महीने से ट्रायल के दौरान उपस्थित न होने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी किया था ।
🚩आरोपी ने गुरुवार को अदालत में एक अर्जी दाखिल कर वारंट वापस लिए जाने की गुजारिश की, जिसके बाद अदालत ने उन्हें पांच पौधे लगाने का आदेश दिया और साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया कि आदेश का पालन किया गया है ।
बता दें कि अलग-अलग मामलों में कोर्ट के अजीबों गरीब फैसले चर्चा में आ जाते हैं । इस तरह के कई मामले पूर्व में भी देखे जा चुके हैं ।
🚩देश के जेलों में कैदियों की दुर्दशा:-
न्यायालय को हमारे देश की जेलों में वर्षों से बंद उन कैदियों के बारे में भी कभी सोचना चाहिए, जो रिहाई के लिए भी वर्षों से तरस रहे हैं । रिहाई की बाट जोहते न जाने कितनी आंखें पथरा गयीं, कितने जिस्मों में झुर्रियां चढ़ आयीं और कितनी ही जिंदगियां काल का ग्रास बन गईं ।
🚩वर्ष 2016 में फिल्म निर्देशक ओमंग कुमार ने अपनी फिल्म ‘सरबजीत’ के जरिये लोगों को यह बताने की कोशिश की थी कि किस तरह से एक निर्दोष और गरीब किसान नशे में धुत होकर भारत की सीमा पार करके पाकिस्तान चला जाता है और फिर वहां उसे उस गुनाह के लिए, जो उसने कभी किया ही नहीं था, तमाम तरह की यातानाएं सहनी पड़ती हैं । भारत की जेलों में भी ऐसे न जाने कितने ‘सरबजीत’ बंद हैं । और अधिक अफसोस की बात तो यह है कि वे पाकिस्तानी नहीं, बल्कि ‘हिंदुस्तानी’ होने के बावजूद यातनापूर्ण कैद का दंश झेल रहे हैं। ऐसे कैदियों में से करीब 67 फीसदी ऐसे विचाराधीन कैदी हैं, जिन्हें ट्रायल, इन्वेस्टीगेशन अथवा इन्क्वायरी के दौरान प्रतिबंधित (detained) कर दिया गया, लेकिन अब तक न्यायालय द्वारा उन्हें अपराधी घोषित नहीं किया गया है ।
🚩कई कैदी जमानत मिल जाने के बावजूद गरीबी या किसी अन्य मजबूरी की वजह से अपनी जमानत देने में सक्षम नहीं हो पाते, वे निरपराध घोषित होने के बावजूद भी जेलों में सड़ने को मजबूर हैं । अगर विचाराधीन कैदियों में इन कैदियों की संख्या को भी मिला लिया जाये, तो यह संख्या शायद लाखों में पहुंच जायेगी ।
🚩भारतीय जेल सांख्यिकी : 2015 के अनुसार, भारतीय जेलों की सबसे बड़ी समस्या क्षमता से अधिक संख्या में कैदियों का होना है । 31 दिसंबर, 2014 तक भारत में कुल 1387 जेल हैं, जिनकी कुल क्षमता 3,56,561 कैदियों की है, जबकि वास्तव में वहां 4,18,536 कैदी  (114.4 फीसदी) रह रहे हैं । इस कारण यहां साफ-सफाई को मेंटेन करना या कैदियों को आधारभूत सुविधाएं भी उपलब्ध करवाना मुश्किल होता है ।
🚩भारतीय जेलों की मुख्यत: तीन प्रमुख समस्याएं हैं :
क्षमता से अधिक कैदियों की संख्या, पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों का न होना और समुचित फंड की कमी । इस वजह से कैदी अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर होते हैं और आये दिन जेल प्रशासन के साथ उनकी झड़प की खबरें भी आती रहती हैं । उचित कानूनी एवं सामाजिक समर्थन का अभाव ‘जिस इंसान के पास सामाजिक स्वतंत्रता नहीं है, उसकी कानूनी स्वतंत्रता भी किसी काम की नहीं होती ।
🚩भगत सिंह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के संदर्भ में देखा जाये, तो कानून की नजर में जब तक किसी व्यक्ति का अपराध साबित नहीं हो जाता, उसे ‘अपराधी’ नहीं माना जा सकता । इसके बावजूद हजारों विचाराधीन कैदी आज अपराधियों की तरह जेल की यातनाएं सहने पर मजबूर हैं । आये दिन उन्हें जेल के अंदर होनेवाली हिंसा का भी शिकार होना पड़ता है । इन सबका सीधा असर उनके मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है । जेल में रहने के दौरान कई कैदियों की मौत हो जाती है, कई अपने परिवार या पड़ोसियों को खो देते हैं, कईयों के घर की पीढ़ियां बचपन से जवानी या जवानी से बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच जाती हैं । इसके अलावा हमारे समाज में जेल की सजा काट कर आये कैदी को हमेशा से ही हिकारत भरी नजरों से देखा जाता रहा है । यहां तक कि जेल से लौटने के बाद उन्हें अपने परिवार या समुदाय से भी वह सम्मान नहीं मिलता, जो पहले मिला करता था । अगर किसी को जमानत मिल भी गयी, तो भी बार-बार अदालत में पेशी होने की वजह से उसे कहीं जॉब मिलने में परेशानी होती है । विचाराधीन कैदियों को कानूनी सहायता भी मुश्किल से मिल पाती है। ऐसे ज्यादातर कैदी गरीब हैं, जिन पर छोटे-मोटे अपराध करने का आरोप है । बावजूद इसके वे लंबे समय से जेलों में बंद है, क्योंकि न तो उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी है और न ही कानूनी सलाहकारों तक उनकी पहुंच है ।
🚩भारतीय संविधान की धारा-21 ने भी भारत के हर व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार दिया है । संविधान यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जायेगा । इसी को ध्यान में रखते हुए पिछले वर्ष माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में अधीनस्थ न्यायालयों को सभी आपराधिक मामलों की जल्द-से-जल्द स्पीडी ट्रायल के लिए सुलझाने का निर्देश जारी किया था । यह फैसला निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, किंतु पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इस फैसले को वास्तविक रूप से अमलीजामा पहनाना उतना ही मुश्किल है । क्षमता से अधिक कैदियों का भार एनसीआरबी द्वारा जारी भारतीय जेल सांख्यिकी के अनुसार, भारतीय जेलों में उनकी वास्तविक क्षमता से करीब 14% अधिक कैदी रह रहे हैं ।  इनमें से करीब दो-तिहाई से भी अधिक कैदी विचाराधीन हैं।
🚩सरकार और न्यायायल को इसपर ध्यान देना चाहिए और जो विचारधीन कैदी है, जिनको झूठे मामलों में सेशन कोर्ट ने सजा भी सुना दी है ऐसा जिस केस में लगता है उनको तुंरत रिहा करना चाहिए ।
🚩सरकार का एक ऐसा भी कर्तव्य बनता है कि समाज को श्रीमद्भागवतगीता अनुसार शिक्षा दी जाए जिससे देश मे कम अपराध हो जिससे न्यायालय, सरकार और जेल प्रशासन को ज्यादा परेशानी न हो सब अपने दिव्य कर्म करके मनुष्य जीवन को सफल बनाए ।
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