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धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले भारत देश में हिंदुओं का कानूनन निम्नीकरण कब तक ???

24 अप्रैल 2019
🚩भारतीय संविधान के अनुसार भारत धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान हर नागरिक को समान मौलिक अधिकार भी देता है । पर वास्तव में ये सब कागज़ों तक ही सीमित है । कानून के द्वारा इस देश में हिंदुओं का निम्नीकरण होता रहा है ।
🚩वैसे तो बहुत सारे उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि केवल हिंदुओं के साथ भेदभाव हुआ है । जैसे सरकार बस मन्दिरों का कानूनन अधिग्रहण कर रही है पर मदरसों और चर्चों की सम्पत्ति उनके धर्म के प्रचार प्रसार में खर्च होती है । मुस्लिम 4 शादी कर सकता है पर बाकी धर्म के लोग केवल एक । मुस्लिमों को हजयात्रा के लिए सब्सिडी मिलती है पर हिंदुओं को अपने ही देश में तीर्थ करने के लिए कर देना पड़ता है ।
🚩आज़ाद भारत आपको हिंदुओं के कानूनन निम्नीकरण का एक और बहुत बड़ा उदाहरण बता रहा है और वो है दहेज, मेहर और उपहार का ।
🚩दहेज हिंदुओं की एक प्रथा है, जिसमें लड़की पक्ष की तरफ से लड़के पक्ष को रुपये, सम्पत्ति या जरूरी सामान दिया जाता है । इस प्रथा को कानूनन अवैध करार किया गया है ।
🚩भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 304 B के अनुसार दहेज प्रताड़ना के कारण अगर किसी महिला की जान जाती है तो उसके लिए न्यूनतम 07 वर्ष और अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है और धारा 498 A के अनुसार दहेज के लिए प्रताड़ित करने पर 03 वर्ष के कारावास का प्रावधान है ।
🚩और तो और 1961 में दहेज निषेध अधिनियम 1961 भी बनाया गया जिसकी धारा 03 के अनुसार दहेज लेने या देने का दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 5 साल की सजा और न्यूनतम 15 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है ।
🚩पूरे हिन्दू समाज ने इस कानून का खुले दिल से स्वागत किया है । अब हिंदुओं में दहेज लेने और देने की कुप्रथा बहुत कम रह गई है ।
🚩पर प्रश्न यह उठता है कि केवल दहेज निषेध के लिए ही कानून क्यों ? इसी तरह की प्रथा जो मुस्लिमों में मेहर नाम से चल रही हैं और ईसाइयों में उपहार (Gift) के नाम से, इनको निषेध करने के लिए आज़ादी के 71 साल बाद भी आज तक कानून क्यों नहीं ?
🚩पहले आपको मेहर नाम से मुस्लिमों में चल रही प्रथा के विषय में बताते हैं । मेहर वो राशि है जो एक मुस्लिम पुरुष मुस्लिम महिला को देता है निकाह के समय । जैसे कोई सामान खरीदने के लिए पैसे देता हैं, ऐसे ही मुस्लिम महिला को निकाह करने के बदले नकद राशि दी जाती है ।
🚩अब उपहार पर आते हैं । उपहार (Gift) वो नकद रुपये, सम्पत्ति या वस्तु होती हैं जो ईसाई शादियों में महिला पक्ष पुरुष पक्ष को देता है ।
🚩अब अगर हम मेहर और उपहार प्रथा की तुलना दहेज प्रथा से करते हैं तो ये लगभग एक तरह की ही है । फिर केवल दहेज निषेध के लिए ही कानून क्यों ? मेहर निषेध और उपहार निषेध के लिए आज़ादी के 71 साल बाद भी कानून क्यों नहीं ?
🚩आज तक केवल दहेज को कुप्रथा बताकर हिंदुओं को बदनाम करने की कोशिश की गई है, हिंदुओं की छवि खराब करने की कोशिश की गई है । दहेज प्रथा गलत है, अब ये हिन्दू भी मानते हैं । पर आज तक सरकार ने मेहर और उपहार को निषेध करने के लिए प्रयास क्यों नहीं किए, कानून क्यों नहीं बनाए ? मेहर और उपहार को निषेध करके समाज को मुस्लिम धर्म और ईसाई धर्म की इस कुप्रथा के विषय से अवगत कराकर समाज को इन कुप्रथाओं से मुक्त करने का प्रयास क्यों नहीं किया गया ? क्यों ऐसी कुप्रथा से घिरे मुस्लिम और ईसाई धर्म की छवि खराब होने से बचाने की कोशिश की गई ? क्यों इनका असली चेहरा सबको नहीं दिखाया ?
🚩एक दूसरा उदाहरण सबरीमाला मंदिर का भी लिया जा सकता है, जहाँ मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा तोड़ कर महिलाओं को प्रवेश दिलाने के लिए कानून बनाया जाता है, भारी मात्रा में पुलिस फ़ोर्स आती है, इस कानून को लागू करने के लिए, लेकिन वहीं दूसरी ओर मदरसों में महिलाओं का प्रवेश निषेध है, उसपर कोई कुछ नहीं बोलता । ईसाइयों और मुस्लिमों के धार्मिक मुद्दों में कोई हस्तेक्षप नहीं करते हैं, लेकिन हिंदुओं के धार्मिक मामलों में ऊलजलूल फैसले सुनाते हैं ।
🚩हिंदुओं के साथ सदा भेदभाव होता आया है । एक तरफ तो भारत देश का संविधान बोलता है कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है तो क्यों केवल हिंदुओं की भावना और छवि से ही खिलवाड़ क्यों किया जाता है ? विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहे जाने वाले देश भारत में केवल हिंदुओं के साथ ही अन्याय क्यों होता है ? क्या यहीं लोकतंत्र है कि एक धर्म विशेष का निम्नीकरण होता रहे और बाकी धर्मों को विशेष लाभ एवं विशेष दर्जा मिलता रहे ? और निम्नीकरण भी कानूनी रूप से करना तो बहुत बड़ा अत्याचार है ।
🚩फिर वही प्रश्न करता हूँ कि केवल दहेज निषेध के लिए ही कानून क्यों बने आज तक? मेहर और उपहार रूपी कुप्रथा को निषेध करने के आज तक कानून क्यों नहीं बने? हिंदुओं का अपने ही देश में कानूनन निम्नीकरण आखिर कब तक???
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